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गरीब, बारद ढुरि कबीर कै, भक्ति हेत के काज।यथार्थ वाणी ऊपर लिखी है, फिर भी हमने भावार्थ समझना है।जब कबीर जी काशी में लीला से लहरतारा तालाब में कमल के फूल पर शिशु रूपमें प्रकट होकर लीला करने आए हुए थे। उसी समय एक रामानन्द जी पंडित थे जो प्रसिद्धआचार्य माने जाते थे। उनको कबीर परमेश्वर जी ने अपने सत्यलोक के दर्शन कराए,अपना परिचय कराया। फिर वापिस शरीर में लाकर छोड़ा। उसके पश्चात् स्वामी रामानन्दजी ने कहा :-
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